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वाल्मीकि रामायण 65.17

तावत् प्रसादो भगवान् अग्नि रूपो महाद्युतिः ।
काल अग्निना यथा पूर्वम् त्रैलोक्यम् दह्यते अखिलम् ॥१-६५-१७॥

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