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वाल्मीकि रामायण 65.15

ब्रह्मन् नप्रतिजानीमो नास्तिको जायते जनः ।
सम्मूढम् इव त्रैलोक्यम् संप्रक्षुभित मानसम् ॥१-६५-१५॥

पूरा अध्याय