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वाल्मीकि रामायण 46.23

तत् अन्तरम् अहम् लब्ध्वा शक्र हन्तारम् आहवे ।
अभिन्दम् सप्तधा देवि तन् मे त्वम् क्षन्तुम् अर्हसि ॥१-४६-२३॥

पूरा अध्याय