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वाल्मीकि रामायण 45.39

उच्चैःश्रवा हय श्रेष्ठो मणि रत्नम् च कौस्तुभम् ।
उदतिष्ठन् नरश्रेष्ठ तथैव अमृतम् उत्तमम् ॥१-४५-३९॥

पूरा अध्याय