Utshovऐप डाउनलोड करें

वाल्मीकि रामायण 43.5

आकाशात् अपतत् राम शिवे शिव शिरस्य् उत ।
अचिन्तयः च सा देवी गंग परम दुर्धरा ॥१-४३-५॥

पूरा अध्याय