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वाल्मीकि रामायण 43.25

मुहुर् ऊर्ध्व पथम् गत्वा पपात वसुधाम् पुनः ।
तत् शंकर शिरो भ्रष्टम् भ्रष्टम् भूमि तले पुनः ॥१-४३-२५॥

पूरा अध्याय