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वाल्मीकि रामायण 43.17

पतद्भिः पतितैः च एव व्यरोचत वसुंधरा ।
ततो देव ऋषि गंधर्वा यक्ष सिद्ध गणाः तथा ॥१-४३-१७॥

पूरा अध्याय