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वाल्मीकि रामायण 32.14

अथ ताः चारु सर्व अंग्यो रूपेण अप्रतिमा भुवि ।
उद्यान भूमिम् आगम्य तारा इव घन अन्तरे ॥१-३२-१४॥

पूरा अध्याय