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वाल्मीकि रामायण 29.32

प्रशुची परम् जाप्यम् समाप्य नियमेन च ।
हुत अग्निहोत्रम् आसीनम् विश्वमित्रम् अवन्दताम् ॥१-२९-३२॥

पूरा अध्याय