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वाल्मीकि रामायण 28.4

सत्यवन्तम् सत्य कीर्तिम् धृष्टम् रभसम् एव च ।
प्रतिहारतरम् नाम पराङ्मुखम् अवाङ्मुखम् ॥१-२८-४॥

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