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वाल्मीकि रामायण 2.43

तद् उपगत समास सन्धि योगम्सम मधुरोपनत अर्थ वाक्य बद्धम् ।
रघुवर चरितम् मुनिप्रणीतम्दश शिरसः च वधम् निशामय अध्वम् ॥१-२-४३॥

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