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वाल्मीकि रामायण 18.59

इति हृदय सुखम् निशम्य वाक्यम्श्रुति सुखम् आत्मवता विनीतम् उक्तम् ।
प्रथित गुण यशा गुणैः विशिष्टःपरम ऋषिः परमम् जगाम हर्षम् ॥१-१८-५९॥

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