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वाल्मीकि रामायण 18.43

प्रति उज्जगाम संहृष्टो ब्रह्माणम् इव वासवः ।
तम् दृष्ट्वा ज्वलितम् दीप्त्या तपसम् संशित व्रतम् ॥१-१८-४३॥

पूरा अध्याय