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वाल्मीकि रामायण 15.17

वैनतेयम् समारूह्य भास्कर तोयदम् यथा ।
तप्त हाटक केयूरो वन्द्यमानः सुरोत्तमैः ॥१-१५-१७॥

पूरा अध्याय