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वाल्मीकि रामायण 14.60

स तस्य वाक्यम् मधुरम् निशम्यप्रणम्य तस्मै प्रयतो नृपेन्द्र ।
जगाम हर्षम् परमम् महात्मातम् ऋष्यश्R^ङ्गम् पुनरपि उवाच ॥१-१४-६०॥

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