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वाल्मीकि रामायण 14.49

मणि रत्नम् सुवर्णम् वा गावो यद् वा समुद्यतम् ।
तत् प्रयच्छ नरश्रेष्ट धरण्या न प्रयोजनम् ॥१-१४-४९॥

पूरा अध्याय