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वाल्मीकि रामायण 11.15

अभिचक्राम तम् देशम् यत्र वै मुनिपुंगवः ।
आसाद्य तम् द्विज श्रेष्ठम् रोमपाद समीपगम् ॥१-११-१५॥

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