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वाल्मीकि रामायण 10.4

इन्द्रियार्थैः अभिमतैः नरचित्त प्रमाथिभि ।
पुरम् आनाययिष्यामः क्षिप्रम् च अध्यवसीयताम् ॥१-१०-४॥

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