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ऋग्वेद 88.5

अ॒ग्निर्न यो वन॒ आ सृ॒ज्यमा॑नो॒ वृथा॒ पाजां॑सि कृणुते न॒दीषु॑ ।
जनो॒ न युध्वा॑ मह॒त उ॑प॒ब्दिरिय॑र्ति॒ सोम॒ः पव॑मान ऊ॒र्मिम् ॥५॥

पूरा अध्याय