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ऋग्वेद 86.4

प्र त॒ आश्वि॑नीः पवमान धी॒जुवो॑ दि॒व्या अ॑सृग्र॒न्पय॑सा॒ धरी॑मणि ।
प्रान्तॠष॑य॒ः स्थावि॑रीरसृक्षत॒ ये त्वा॑ मृ॒जन्त्यृ॑षिषाण वे॒धस॑ः ॥४॥

पूरा अध्याय