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ऋग्वेद 110.5

अ॒भ्य॑भि॒ हि श्रव॑सा त॒तर्दि॒थोत्सं॒ न कं चि॑ज्जन॒पान॒मक्षि॑तम् । शर्या॑भि॒र्न भर॑माणो॒ गभ॑स्त्योः ॥५॥

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