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ऋग्वेद 110.3

अजी॑जनो॒ हि प॑वमान॒ सूर्यं॑ वि॒धारे॒ शक्म॑ना॒ पय॑ः । गोजी॑रया॒ रंह॑माण॒ः पुरं॑ध्या ॥३॥

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