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ऋग्वेद 95.1

आ त्वा॒ गिरो॑ र॒थीरि॒वाऽस्थु॑ः सु॒तेषु॑ गिर्वणः । अ॒भि त्वा॒ सम॑नूष॒तेन्द्र॑ व॒त्सं न मा॒तर॑ः ॥१॥

पूरा अध्याय