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ऋग्वेद 90.1

आ नो॒ विश्वा॑सु॒ हव्य॒ इन्द्र॑ः स॒मत्सु॑ भूषतु । उप॒ ब्रह्मा॑णि॒ सव॑नानि वृत्र॒हा प॑रम॒ज्या ऋची॑षमः ॥१॥

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