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ऋग्वेद 87.5

आ नू॒नं या॑तमश्वि॒नाऽश्वे॑भिः प्रुषि॒तप्सु॑भिः । दस्रा॒ हिर॑ण्यवर्तनी शुभस्पती पा॒तं सोम॑मृतावृधा ॥५॥

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