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ऋग्वेद 51.1

यथा॒ मनौ॒ सांव॑रणौ॒ सोम॑मि॒न्द्रापि॑बः सु॒तम् । नीपा॑तिथौ मघव॒न्मेध्या॑तिथौ॒ पुष्टि॑गौ॒ श्रुष्टि॑गौ॒ सचा॑ ॥१॥

पूरा अध्याय