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ऋग्वेद 49.7

यद्ध॑ नू॒नं यद्वा॑ य॒ज्ञे यद्वा॑ पृथि॒व्यामधि॑ । अतो॑ नो य॒ज्ञमा॒शुभि॑र्महेमत उ॒ग्र उ॒ग्रेभि॒रा ग॑हि ॥७॥

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