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ऋग्वेद 47.3

व्य१स्मे अधि॒ शर्म॒ तत्प॒क्षा वयो॒ न य॑न्तन ।
विश्वा॑नि विश्ववेदसो वरू॒थ्या॑ मनामहेऽने॒हसो॑ व ऊ॒तय॑ः सु॒ऊतयो॑ व ऊ॒तय॑ः ॥३॥

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