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ऋग्वेद 29.3

ति॒ग्ममेको॑ बिभर्ति॒ हस्त॒ आयु॑धं॒ शुचि॑रु॒ग्रो जला॑षभेषजः
प॒थ एक॑ः पीपाय॒ तस्क॑रो यथाँ ए॒ष वे॑द निधी॒नाम् ॥३॥

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