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ऋग्वेद 13.5

नू॒नं तदि॑न्द्र दद्धि नो॒ यत्त्वा॑ सु॒न्वन्त॒ ईम॑हे । र॒यिं न॑श्चि॒त्रमा भ॑रा स्व॒र्विद॑म् ॥५॥

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