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ऋग्वेद 81.5

तच्चि॒त्रं राध॒ आ भ॒रोषो॒ यद्दी॑र्घ॒श्रुत्त॑मम् ।
यत्ते॑ दिवो दुहितर्मर्त॒भोज॑नं॒ तद्रा॑स्व भु॒नजा॑महै ॥५॥

पूरा अध्याय