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ऋग्वेद 32.27

मा नो॒ अज्ञा॑ता वृ॒जना॑ दुरा॒ध्यो॒३ माशि॑वासो॒ अव॑ क्रमुः ।
त्वया॑ व॒यं प्र॒वत॒ः शश्व॑तीर॒पोऽति॑ शूर तरामसि ॥२७॥

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