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ऋग्वेद 3.6

सु॒सं॒दृक्ते॑ स्वनीक॒ प्रती॑कं॒ वि यद्रु॒क्मो न रोच॑स उपा॒के ।
दि॒वो न ते॑ तन्य॒तुरे॑ति॒ शुष्म॑श्चि॒त्रो न सूर॒ः प्रति॑ चक्षि भा॒नुम् ॥६॥

पूरा अध्याय