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ऋग्वेद 18.2

स यु॒ध्मः सत्वा॑ खज॒कृत् स॒मद्वा॑ तुविम्र॒क्षो न॑दनु॒माँ ऋ॑जी॒षी ।
बृ॒हद्रे॑णु॒श्च्यव॑नो॒ मानु॑षीणा॒मेक॑ः कृष्टी॒नाम॑भवत् स॒हावा॑ ॥२॥

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