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ऋग्वेद 16.28

अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द् विश्वं॒ न्य१त्रिण॑म् । अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम् ॥२८॥

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