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ऋग्वेद 31.2

आ प्र द्र॑व हरिवो॒ मा वि वे॑न॒ः पिश॑ङ्गराते अ॒भि न॑ः सचस्व ।
न॒हि त्वदि॑न्द्र॒ वस्यो॑ अ॒न्यदस्त्य॑मे॒नाँश्चि॒ज्जनि॑वतश्चकर्थ ॥२॥

पूरा अध्याय