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ऋग्वेद 6.5

परि॒ त्मना॑ मि॒तद्रु॑रेति॒ होता॒ ऽग्निर्म॒न्द्रो मधु॑वचा ऋ॒तावा॑ ।
द्रव॑न्त्यस्य वा॒जिनो॒ न शोका॒ भय॑न्ते॒ विश्वा॒ भुव॑ना॒ यदभ्रा॑ट् ॥५॥

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