ऋग्वेद 45.2
उद् वां॑ पृ॒क्षासो॒ मधु॑मन्त ईरते॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु ।
अ॒पो॒र्णु॒वन्त॒स्तम॒ आ परी॑वृतं॒ स्व१र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रज॑ः ॥२॥
उद् वां॑ पृ॒क्षासो॒ मधु॑मन्त ईरते॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टिषु ।
अ॒पो॒र्णु॒वन्त॒स्तम॒ आ परी॑वृतं॒ स्व१र्ण शु॒क्रं त॒न्वन्त॒ आ रज॑ः ॥२॥