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ऋग्वेद 43.2

को मृ॑ळाति कत॒म आग॑मिष्ठो दे॒वाना॑मु कत॒मः शम्भ॑विष्ठः ।
रथं॒ कमा॑हुर्द्र॒वद॑श्वमा॒शुं यं सूर्य॑स्य दुहि॒तावृ॑णीत ॥२॥

पूरा अध्याय