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ऋग्वेद 16.4

चक्रि॒र्यो विश्वा॒ भुव॑ना॒भि सा॑स॒हिश्चक्रि॑र्दे॒वेष्वा दुव॑ः ।
आ दे॒वेषु॒ यत॑त॒ आ सु॒वीर्य॒ आ शंस॑ उ॒त नृ॒णाम् ॥४॥

पूरा अध्याय