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ऋग्वेद 29.1

धृत॑व्रता॒ आदि॑त्या॒ इषि॑रा आ॒रे मत् क॑र्त रह॒सूरि॒वाग॑ः ।
शृ॒ण्व॒तो वो॒ वरु॑ण॒ मित्र॒ देवा॑ भ॒द्रस्य॑ वि॒द्वाँ अव॑से हुवे वः ॥१॥

पूरा अध्याय