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ऋग्वेद 27.6

सु॒गो हि वो॑ अर्यमन्मित्र॒ पन्था॑ अनृक्ष॒रो व॑रुण सा॒धुरस्ति॑ ।
तेना॑दित्या॒ अधि॑ वोचता नो॒ यच्छ॑ता नो दुष्परि॒हन्तु॒ शर्म॑ ॥६॥

पूरा अध्याय