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ऋग्वेद 89.9

प्र ये मि॒त्रं प्रार्य॒मणं॑ दु॒रेवा॒ः प्र सं॒गिर॒ः प्र वरु॑णं मि॒नन्ति॑ ।
न्य१मित्रे॑षु व॒धमि॑न्द्र॒ तुम्रं॒ वृष॒न्वृषा॑णमरु॒षं शि॑शीहि ॥९॥

पूरा अध्याय