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ऋग्वेद 86.7

उ॒वे अ॑म्ब सुलाभिके॒ यथे॑वा॒ङ्ग भ॑वि॒ष्यति॑ ।
भ॒सन्मे॑ अम्ब॒ सक्थि॑ मे॒ शिरो॑ मे॒ वी॑व हृष्यति॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥७॥

पूरा अध्याय