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ऋग्वेद 4.3

शिशुं॒ न त्वा॒ जेन्यं॑ व॒र्धय॑न्ती मा॒ता बि॑भर्ति सचन॒स्यमा॑ना ।
धनो॒रधि॑ प्र॒वता॑ यासि॒ हर्य॒ञ्जिगी॑षसे प॒शुरि॒वाव॑सृष्टः ॥३॥

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