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ऋग्वेद 23.4

सो चि॒न्नु वृ॒ष्टिर्यू॒थ्या॒३ स्वा सचाँ॒ इन्द्र॒ः श्मश्रू॑णि॒ हरि॑ता॒भि प्रु॑ष्णुते ।
अव॑ वेति सु॒क्षयं॑ सु॒ते मधूदिद्धू॑नोति॒ वातो॒ यथा॒ वन॑म् ॥४॥

पूरा अध्याय