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ऋग्वेद 163.2

ग्री॒वाभ्य॑स्त उ॒ष्णिहा॑भ्य॒ः कीक॑साभ्यो अनू॒क्या॑त् । यक्ष्मं॑ दोष॒ण्य१मंसा॑भ्यां बा॒हुभ्यां॒ वि वृ॑हामि ते ॥२॥

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