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ऋग्वेद 152.4

वि न॑ इन्द्र॒ मृधो॑ जहि नी॒चा य॑च्छ पृतन्य॒तः । यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॒त्यध॑रं गमया॒ तम॑ः ॥४॥

पूरा अध्याय