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ऋग्वेद 133.6

व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यव॑ः सखि॒त्वमा र॑भामहे ।
ऋ॒तस्य॑ नः प॒था न॒याऽति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥६॥

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