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ऋग्वेद 133.3

वि षु विश्वा॒ अरा॑तयो॒ऽर्यो न॑शन्त नो॒ धिय॑ः ।
अस्ता॑सि॒ शत्र॑वे व॒धं यो न॑ इन्द्र॒ जिघां॑सति॒ या ते॑ रा॒तिर्द॒दिर्वसु॒ नभ॑न्तामन्य॒केषां॑ ज्या॒का अधि॒ धन्व॑सु ॥३॥

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